ग्वालियर। ग्वालियर की पहचान केवल किलों, महलों और संगीत परंपरा तक सीमित नहीं है। यहाँ की लोक संस्कृति में साहस, मनोरंजन और पारंपरिक कला का अद्भुत संगम देखने को मिलता है, जिसकी एक अनूठी मिसाल रियासतकाल से चला आ रहा ऐतिहासिक 'चकरी मेला' (स्थानीय स्तर पर चर्की मेला) है।
रक्षाबंधन के अगले दिन भुजरिया या देवछठ के आसपास आयोजित होने वाले इस प्रसिद्ध मेले का शहरवासियों को इस बार कुछ दिन इंतजार करना पड़ेगा।
बारिश और जलभराव के कारण देरी
लगातार हो रही बारिश के चलते मेला मैदान में पानी भर गया है। नगर निगम प्रशासन के अनुसार, मैदान सूखने और व्यवस्थाएं दुरुस्त होने के बाद ही चकरी मेले का आयोजन शुरू कराया जाएगा।
मेले से जुड़े मुख्य आकर्षण:
इस मेले की सबसे खास पहचान चकरी घुमाने की पारंपरिक और साहसिक कला है। राठौर परिवार पिछले पाँच पीढ़ियों से इस अनूठी पारंपरिक कला को जीवित रखे हुए है। सिंधिया रियासतकाल में शुरू हुई यह परंपरा आजादी और रियासतकाल समाप्त होने के इतने वर्षों बाद भी आज भी उतनी ही धूमधाम से जारी है।

