सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक सेवा परीक्षा के लिए वकालत की अनिवार्य अवधि घटाकर एक वर्ष की

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने प्रवेश स्तर की न्यायिक सेवा परीक्षाओं में शामिल होने वाले विधि स्नातकों को बड़ी राहत दी है। शीर्ष अदालत ने अनिवार्य तीन वर्ष की वकालत अवधि को घटाकर एक वर्ष कर दिया है। कोर्ट ने पिछले वर्ष दिए अपने फैसले में संशोधन करते हुए यह व्यवस्था लागू की है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति एजी मसीह और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने पुनर्विचार याचिका पर 2:1 के बहुमत से फैसला सुनाया। कोर्ट के इस निर्णय से नए विधि स्नातकों के लिए न्यायिक सेवा में प्रवेश का रास्ता आसान होगा।

31 मार्च 2027 तक की परीक्षाओं में लागू होगा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 25 मई 2025 से 31 मार्च 2027 के बीच अधिसूचित होने वाली न्यायिक सेवा परीक्षाओं में शामिल होने वाले उम्मीदवार बिना पूर्व वकालत अनुभव के भी पात्र होंगे। यानी इन परीक्षाओं के लिए तीन वर्ष की प्रैक्टिस की शर्त लागू नहीं होगी।

हालांकि चयनित उम्मीदवारों को सीधे नियमित न्यायिक अधिकारी के रूप में नियुक्त नहीं किया जाएगा। उन्हें पहले प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारियों के रूप में प्रशिक्षण प्रक्रिया से गुजरना होगा।

दो साल की प्रशिक्षण प्रक्रिया से गुजरना होगा

चयनित उम्मीदवारों को न्यायिक अकादमी में एक वर्ष का प्रशिक्षण लेना होगा। इसके बाद उन्हें एक वर्ष की स्ट्रक्चर्ड क्लर्कशिप यानी व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा। इस तरह नियुक्ति के बाद कुल दो वर्ष की प्रशिक्षण व्यवस्था से गुजरना होगा।

पिछले साल लागू की गई थी तीन साल की शर्त

सुप्रीम कोर्ट ने 20 मई 2025 को दिए अपने फैसले में नए विधि स्नातकों को प्रवेश स्तर की न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल होने से रोक दिया था। कोर्ट ने परीक्षा के लिए कम से कम तीन वर्ष की कानूनी वकालत को अनिवार्य कर दिया था।

अब शीर्ष अदालत ने अपने उस फैसले में संशोधन करते हुए वकालत की अनिवार्य अवधि को घटाकर एक वर्ष कर दिया है। इससे कानून की पढ़ाई पूरी करने वाले युवाओं को न्यायिक सेवा परीक्षाओं में अवसर मिलने की संभावना बढ़ गई है।